पं. बालकृष्ण भट्ट : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

पं. बालकृष्ण भट्ट : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

भट्ट का जन्म प्रयाग में संवत् 1901 में और परलोकवास संवत् 1971 में हुआ। ये प्रयाग के ‘कायस्थ पाठशाला’ कॉलेज में संस्कृत के अध्यापक थे।

उन्होंने संवत् 1933 में अपना ‘हिन्दी प्रदीप’ गद्य साहित्य का ढर्रा निकालने के लिए ही निकाला था। सामाजिक, साहित्यिक, राजनीतिक, नैतिक सब प्रकार के छोटे छोटे गद्य प्रबंध ये अपने पत्र में तीस वर्ष तक निकालते रहे। उनके (बालकृष्ण भट्ट के) लिखने का ढंग पं. प्रतापनारायण के ढंग से मिलता-जुलता है। मिश्रजी के समान भट्टजी भी स्थान स्थान पर कहावतों का प्रयोग करते थे, पर उनका झुकाव मुहावरों की ओर कुछ अधिक रहा है। व्यंग्य और वक्रता उनके लेखों में भी भरी रहती है और वाक्य भी कुछ बड़े बड़े होते हैं। ठीक खड़ी बोली के आदर्श का निर्वाह भट्ट जी ने भी नहीं किया है। पूरबी प्रयोग बराबर मिलते हैं ‘समझा बुझाकर’ के स्थान पर ‘समझाय बुझाय’ वे प्राय: लिख जाते थे। उनके लिखने के ढंग से यह जान पड़ता है कि वे अंग्रेजी पढ़े लिखे नवशिक्षित लोगों को हिन्दी की ओर आकर्षित करने के लिए लिख रहे हैं। स्थान स्थान पर ब्रैकेट में घिरे अंग्रेजी शब्द पाए जाते हैं। इसी प्रकार फारसी अरबी के लफ्ज ही नहीं, बड़े बड़े फिकरे तक भट्टजी अपनी मौज में आकर रखा करते थे। इस प्रकार उनकी शैली में एक निरालापन झलकता है। प्रतापनारायण के हास्यविनोद से भट्टजी के हास्यविनोद में यह विशेषता है कि वह कुछ चिड़चिड़ाहट लिए रहता था। पदविन्यास भी कभी उसका बहुत ही चोखा और अनूठा होता था।

अनेक प्रकार के गद्य प्रबंध भट्टजी ने लिखे हैं, पर सब छोटे छोटे। वे बराबर कहा करते थे कि न जाने कैसे लोग बड़े बड़े लेख लिख डालते हैं। मुहावरों की सूझ उनकी बहुत अच्छी थी। ‘आँख’, ‘कान’, ‘नाक’ आदि शीर्षक देकर उन्होंने कई लेखों में बड़े ढंग के साथ मुहावरों की झड़ी बाँधा दी है। एक बार वे मेरे घर पधारे थे। मेरा छोटा भाई आँखों पर हाथ रखे उन्हें दिखाई पड़ा। उन्होंने पूछा ‘भैया! आँख में क्या हुआ है?’ उत्तर मिला ‘आँख आई है।’ ये चट बोल उठे ‘भैया! यह आँख बड़ी बला है, इसका आना, जाना, उठना, बैठना सब बुरा है।’ अनेक विषयों पर गद्य प्रबंध लिखने के अतिरिक्त ‘हिन्दी प्रदीप’ द्वारा भट्टजी संस्कृत साहित्य और संस्कृत के कवियों का परिचय भी अपने पाठकों को समय समय पर कराते रहे। पं. प्रतापनारायण मिश्र और बालकृष्ण भट्ट ने हिन्दी गद्य साहित्य में वही काम किया है जो अंग्रेजी गद्य साहित्य में एडीसन और स्टील ने किया था। भट्टजी की लिखावट के दो नमूने देखिए :

कल्पना

यावत मिथ्या और दरोग की किबलेगाह इस कल्पना पिशाचिनी का कहीं ओर छोर किसी ने पाया है? अनुमान करते करते हैरान गौतम से मुनि ‘गोतम’ हो गए। कणाद तिनका खा खाकर किनका बीनने लगे पर मन की मनभावनी कन्या कल्पना का पार न पाया। कपिल बेचारे पचीस तत्वों की कल्पना करते करते ‘कपिल’ अर्थात् पीले पड़ गए। व्यास ने इन तीनों दार्शनिकों की दुर्गति देख मन में सोचा, कौन इस भूतनी के पीछे दौड़ता फिरे, यह संपूर्ण विश्व जिसे हम प्रत्यक्ष देख सुन सकते हैं, सब कल्पना ही कल्पना, मिथ्या, नाशवान् और क्षणभंगुर है। अतएव हेय है।

आत्मनिर्भरता

इधर पचास साठ वर्षों से अंग्रेजी राज्य के अमन चैन का फ़ायदा पाय हमारे देशवाले किसी की भलाई की ओर न झुके वरन् दस वर्ष की गुड़ियों का ब्याह कर पहले से डयोढ़ी दूनी सृष्टि अलबत्ता बढ़ाने लगे। हमारे देश की जनसंख्या अवश्य घटनी चाहिए। ××× आत्मनिर्भरता में दृढ़, अपने कूवते बाजू पर भरोसा रखनेवाला, पुष्टवीर्य, पुष्टबल, भाग्यवान, एक संतान अच्छा। ‘कूकर सूकर से’ निकम्मे, रग रग में दास भाव से पूर्ण, पर भाग्योपजीवी दस किस काम के?

    निबंधों के अतिरिक्त भट्टजी ने कई छोटे मोटे नाटक भी लिखे हैं जो क्रमश: उनके ‘हिन्दी प्रदीप’ में छपे हैं, जैसे : कलिराज की सभा, रेल का विकट खेल, बालविवाह नाटक, चंद्रसेन नाटक। उन्होंने माइकेल मधुसूदन दत्त के ‘पद्मावती’ और ‘शर्मिष्ठा’ नामक बंग भाषा के दो नाटकों के अनुवाद भी निकाले थे।

    संवत् 1943 में भट्टजी ने लाला श्रीनिवासदास के ‘संयोगिता स्वयंवर’ नाटक की ‘सच्ची समालोचना’ भी, और पत्रों में उसकी प्रशंसा ही प्रशंसा देखकर की थी।

उसी वर्ष (संवत् 1943 में) उपाधयाय पं. प्रतापनारायण मिश्र, उपाधयाय बदरीनारायण चौधरी, ठाकुर जगमोहन सिंह, पं. बालकृष्ण भट्ट मुख्य रूप से गिने जा सकते हैं। इन लेखकों की शैलियों में व्यक्तिगत विभिन्नता स्पष्ट लक्षित हुई।

पं. बालकृष्ण भट्ट की भाषा अधिकतर वैसी ही होती थी जैसी खरी खरी सुनाने में काम में लाई जाती है। जिन लेखों में उनकी चिड़चिड़ाहट झलकती है वे विशेष मनोरंजक हैं। नूतन पुरातन का वह संघर्षकाल था इसमें भट्टजी को चिढ़ाने की पर्याप्त सामग्री मिल जाया करती थी। समय के प्रतिकूल पुराने बद्ध मूल विचारों को उखाड़ने और परिस्थिति के अनुकूल नए विचारों को जमाने में उनकी लेखनी सदा तत्पर रहती थी। भाषा उनकी चटपटी, तीखी और चमत्कारपूर्ण होती थी

—रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल, प्रकरण 1 : गद्य का प्रर्वन : सामान्य परिचय

पं. बालकृष्ण भट्ट ने ‘नूतन ब्रह्मचारी’ तथा ‘सौ अजान और एक सुजान’ नामक छोटे छोटे उपन्यास लिखे। उस समय तक बंगभाषा में बहुत से अच्छे उपन्यास निकल चुके थे। अत: साहित्य के इस विभाग की शून्यता शीघ्र हटाने के लिए अनुवाद आवश्यक प्रतीत हुए।

—रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल, प्रकरण 1 : गद्य का प्रर्वन : सामान्य परिचय