#मुंशी सदासुखलाल ‘नियाज’ (1746-1824 ई.) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

#मुंशी सदासुखलाल नियाज‘ (1746-1824 ई.) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

#मुंशी सदासुखलाल नियाजदिल्ली के रहनेवाले थे। इनका #जन्म संवत् 1803 और #मृत्यु 1881 में हुई। संवत् 1850 के लगभग ये कंपनी की अधीनता में #चुनार (जिला, मिर्जापुर) में एक अच्छे पद पर थे। इन्होंने उर्दू और फारसी में बहुत सी किताबें लिखी हैं और काफी शायरी की है। अपनी #मुंतखबुत्तावारीख में अपने संबंध में इन्होंने जो कुछ लिखा है उससे पता चलता है कि 65 वर्ष की अवस्था में ये नौकरी छोड़कर प्रयाग चले गए और अपनी शेष आयु वहीं हरिभजन में बिताई। उक्त पुस्तक संवत् 1875 में समाप्त हुई जिसके छह वर्ष उपरांत इनका परलोकवास हुआ। मुंशीजी ने विष्णुपुराण से कोई उपदेशात्मक प्रसंग लेकर एक पुस्तक लिखी थी, जो पूरी नहीं मिली है। कुछ दूर तक सफाई के साथ चलने वाला गद्य जैसा भाषायोगवासिष्ठका था वैसा ही मुंशीजी की इस पुस्तक में दिखाई पड़ा। उसका थोड़ा-सा अंश नीचे उध्दृत किया जाता है

#इससे जाना गया कि संस्कार का भी प्रमाण नहीं; आरोपित उपाधि है। जो क्रिया उत्तम हुई तो सौ वर्ष में चांडाल से ब्राह्मण हुए और जो क्रिया भ्रष्ट हुई तो वह तुरंत ही ब्राह्मण से चांडाल होता है। यद्यपि ऐसे विचार से हमें लोग नास्तिक कहेंगे, हमें इस बात का डर नहीं। जो बात सत्य होय उसे कहना चाहिए कोई बुरा माने कि भला माने। विद्या इसी हेतु पढ़ते हैं कि तात्पर्य इसका (जो) सतोवृत्ति है वह प्राप्त हो और उससे निज स्वरूप में लय हूजिए। इस हेतु नहीं पढ़ते हैं कि चतुराई की बातें कह के लोगों को बहकाइए और फुसलाइए और सत्य छिपाइए, व्यभिचार कीजिए और सुरापान कीजिए और धान द्रव्य इकठौर कीजिए और मन को, कि तमोवृत्ति से भर रहा है निर्मल न कीजिए। तोता है सो नारायण का नाम लेता है, परंतु उसे ज्ञान तो नहीं है।

मुंशीजी ने यह गद्य न तो किसी अंगरेज अधिकारी की प्रेरणा से और न किसी दिए हुए नमूने पर लिखा। वे एक भगवद्भक्त थे। अपने समय में उन्होंने हिंदुओं की बोलचाल की जो शिष्ट भाषा चारों ओर, पूरबी प्रांतों में भी, प्रचलित पाई उसी में रचना की। स्थान स्थान पर शुद्ध तत्सम संस्कृत शब्दों का प्रयोग करके उन्होंने उसके भावी साहित्यिक रूप का पूर्ण आभास दिया। यद्यपि वे खास दिल्ली के रहने वाले अह्लेजबान थे पर उन्होंने अपने हिन्दी गद्य में कथावाचकों, पंडितों और साधु संतों के बीच दूर दूर तक प्रचलित खड़ी बोली का रूप रखा, जिसमें संस्कृत शब्दों का पुट भी बराबर रहता था। इसी #संस्कृतमिश्रित हिन्दी को उर्दूवाले भाषाकहते थे जिसका चलन उर्दू के कारण कम होते देख मुंशी सदासुख ने इस प्रकार खेद प्रकट किया था

#रस्मौ रिवाज भाखा का दुनिया से उठ गया।

सारांश यह कि #मुंशीजी ने हिंदुओं की शिष्ट बोलचाल की भाषा ग्रहण की, उर्दू से अपनी भाषा नहीं ली। इन प्रयोगों से यह बात स्पष्ट हो जाती है

स्वभाव करके वे दैत्य कहलाए। बहुत जाधा चूक हुई। उन्हीं लोगों से बन आवै है। जो बात सत्य होय।

काशी पूरब में है पर यहाँ के पंडित सैकड़ों वर्ष से होयगा‘, ‘आवता है‘, ‘इस करकेआदि बोलते चले आते हैं। ये सब बातें उर्दू से स्वतंत्र खड़ी बोली के प्रचार की सूचना देती हैं। (आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 1 : गद्य का विकास : खड़ बोली का गद्य)

#मुंशी सदासुखलाल भी #दिल्ली खास के थे और #उर्दू साहित्य का अभ्यास भी पूरा रखते थे, पर वे #धर्मभाव से जानबूझकर अपनी भाषा गंभीर और संयत रखना चाहते थे।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 1 : गद्य का विकास : खड़ बोली का गद्य, पृ. 229)

यद्यपि #मुंशी सदासुखलाल ने भी अरबीफारसी के शब्दों का प्रयोग न कर संस्कृतमिश्रित साधु भाषा लिखने का प्रयत्न किया है पर लल्लूलाल की भाषा से उसमें बहुत कुछ भेद दिखाई पड़ता है। #मुंशीजी की भाषा साफसुथरी खड़ी बोली है पर लल्लूलाल की भाषा कृष्णोपासक व्यासों की-सी ब्रजरंजित खड़ी बोली है। सम्मुख जाय‘, ‘सिर नाय‘, ‘सोई‘, ‘भई‘, ‘कीजै‘, ‘निरख‘, ‘लीजौऐसे शब्द बराबर प्रयुक्त हुए हैं। (आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 1 : गद्य का विकास : खड़ बोली का गद्य, पृ. 230)

#आधुनिक हिन्दी का पूरा पूरा आभास मुंशी सदासुखलाल और सदल मिश्र की भाषा में ही मिलता है। व्यवहारोपयोगी इन्हीं की भाषा ठहरती है। …… #मुंशी सदासुख की साधु भाषा अधिक महत्व की है। मुंशी सदासुख ने लेखनी भी चारों में पहले उठाई, अत: गद्य का प्रवर्तन करनेवालों में उनका विशेष स्थान समझना चाहिए। (आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 1 : गद्य का विकास : खड़ बोली का गद्य, पृ. 232)

#संवत् 1909 में आगरे से #मुंशी सदासुखलाल के प्रबंध और संपादन में #बुद्धि प्रकाशनिकला जो कई वर्ष तक चलता रहा। बुद्धि प्रकाशकी भाषा उस समय को देखते हुए बहुत अच्छी होती थी। नमूना देखिए—

कलकत्ते के समाचार

#इस पश्चिमीय देश में बहुतों को प्रगट है कि बंगाले की रीति के अनुसार उस देश के लोग आसन्नमृत्यु रोगी को गंगातट पर ले जाते हैं और यह तो नहीं करते कि उस रोगी के अच्छे होने के लिए उपाय करने में काम करें और उसे यत्न से रक्षा में रक्खें वरन् उसके विपरीत रोगी को जल के तट पर ले जाकर पानी में गोते देते हैं और हरी बोल‘, ‘हरी बोलकहकर उसका जीव लेते हैं।

स्त्रियों की शिक्षा के विषय

#स्त्रियों में संतोष और नम्रता और प्रीत यह सब गुण कर्ता ने उत्पन्न किए हैं, केवल विद्या की न्यूनता है, जो यह भी हो तो स्त्रिायाँ अपने सारे ऋण से चुक सकती हैं और लड़कों को सिखानापढ़ाना जैसा उनसे बन सकता है वैसा दूसरों से नहीं। यह काम उन्हीं का है कि शिक्षा के कारण बाल्यावस्था में लड़कों को भूलचूक से बचावें और सरलसरल विद्या उन्हें सिखाएँ।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 1 : गद्य का विकास : खड़ बोली का गद्य, पृ. 236, 237)

(मुंशी सदासुखलाल या सदासुखराय पर यह आलेख आचार्य रामचंद्र शुक्ल के प्रसिद्ध इतिहास-ग्रंथ हिंदी साहित्य का इतिहास नागरी प्रचारी सभा, वाराणसी, 38वाँ संस्करण, संवत् 2027 विक्रम के आधार पर साभार तैयार किया गया है।)