#राजा शिवप्रसाद #सितारेहिंद (1823-1895 ई.) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

#राजा शिवप्रसाद #सितारेहिंद (1823-1895 ई.) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

#राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद की #रचनाएँ—

  1. #आलसियों का कोड़ा
  2. #वर्णमाला
  3. #स्वयंबोध उर्दू
  4. #वामा मनरंजन (1886 ई.)
  5. #विद्यांकुर
  6. #राजा भोज का सपना (1887 ई.)
  7. #भूगोलहस्तामलक
  8. #इतिहासतिमिरनाशक
  9. #गुटका
  10. #हिंदी व्याकरण
  11. #हिन्दुस्तान के पुराने राजाओं का हाल
  12. #मानवधर्मसार
  13. #सिक्खों का उदय और अस्त
  14. #योगवासिष्ठ के कुछ चुने ङुए शलोक
  15. #उपनिषद्सार
  16. #बैताल पच्चीसी
  17. #वीरसिंह का वृत्तांत
  18. #सवानेह-उमरी (आत्मकथा)
  19. #लिपि सम्बन्धी प्रतिवेदन (1868 ई.)
  20. #कबीर टीका
  21. #गीतगोविन्दादर्श
  22. #बच्चों का इनाम
  23. #लड़कों की कहानी

E सिक्खों का उदय और अस्त, योगवासिष्ठ के कुछ चुने ङुए शलोक और उपनिषद्सार की भाषा संस्कृतनिष्ठ है।

E आलसियों का कोड़ा, स्वयंबोध उर्दू, वामा मनरंजन, विद्यांकुर, राजा भोज का सपनाइन पुस्तकों की भाषा सरल हिंदी है। 

 

राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द का जन्म 03 फ़रवरी 1823 को काशी (वाराणसी, उत्तर प्रदेश) में और देहावसान 23 मई 1895 ई. को हुआ।

राजा शिवप्रसाद विद्याव्यसनी होने के कारण अपनी भाषा हिन्दी की ओर उनका ध्यान था। अत: इधर उधर दूसरी भाषाओं में समाचार पत्र निकलते देख उन्होंने उक्त संवत् में उद्योग करके काशी से बनारस अखबारनिकलवाया। पर अखबार पढ़नेवाले पहले पहल नवशिक्षितों में मिल सकते थे जिनकी लिखने पढ़ने की भाषा उर्दू ही हो रही थी। अत: इस पत्र की भाषा भी उर्दू ही रखी गई, यद्यपि अक्षर देवनागरी के थे। यह पत्र बहुत ही घटिया कागज पर लीथो में छपता था। भाषा इसकी यद्यपि गहरी उर्दू होती थी पर हिन्दी की कुछ सूरत पैदा करने के लिए बीच में धर्मात्मा‘, ‘परमेश्वर‘, ‘दयाऐसे कुछ शब्द भी रख दिए जाते थे। इसमें राजा साहब भी कभी कभी कुछ लिख दिया करते थे। (आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 1 : गद्य का विकास : खड़ बोली का गद्य, पृ. 230)

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 1 : गद्य का विकास : खड़ बोली का गद्य, पृ. 236)

इस प्रांत (उत्तर प्रदेश) के हिंदुओं में राजा शिवप्रसाद अंग्रेजों के उसी ढंग के कृपापात्र थे जिस ढंग से सर सैयद अहमद। अत: हिन्दी की रक्षा के लिए उन्हें खड़ा होना पड़ा और वे बराबर इस संबंध में यत्नशील रहे। इससे हिन्दी उर्दू का झगड़ा बीसों वर्ष तक, भारतेंदु के समय तक, चलता रहा।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 1 : गद्य का विकास : खड़ बोली का गद्य, पृ. 237)

राजा और भारतेंदु के समय तक हिन्दी उर्दू का झगड़ा चलता रहा। (शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 1 : गद्य का विकास : खड़ बोली का गद्य, पृ. 237)

इसी खींचतान के समय में राजा लक्ष्मण और राजा शिवप्रसाद मैदान में आए। (शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 1 : गद्य का विकास : खड़ बोली का गद्य, पृ. 238)

संवत् 1913 में अर्थात् बलवे के एक वर्ष पहले राजा शिवप्रसाद शिक्षाविभाग में इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त हुए। उस समय दूसरे विभागों के समान शिक्षाविभाग में भी मुसलमानों का जोर था जिनके मन में भाखापनका डर बराबर समाया रहता था। वे इस बात से डरा करते थे कि कहीं नौकरी के लिए भाखासंस्कृत से लगाव रखनेवाली हिन्दी‘, न सीखनी पड़े। अत: उन्होंने पहले तो उर्दू के अतिरिक्त हिन्दी की पढ़ाई की व्यवस्था का घोर विरोध किया। उनका कहना था कि जब अदालती कामों में उर्दू ही काम में लाई जाती है तब एक और जबान का बोझ डालने से क्या लाभ?भाखामें हिंदुओं की कथावार्ता आदि कहते सुन वे हिन्दी को गँवारीबोली भी कहा करते थे। इस परिस्थिति में राजा शिवप्रसाद को हिन्दी की रक्षा के लिए बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ा। हिन्दी का सवाल जब आता तब मुसलमान उसे मुश्किल जबानकहकर विरोध करते। अत: राजा साहब के लिए उस समय यही संभव दिखाई पड़ा कि जहाँ तक हो सके ठेठ हिन्दी का आश्रय लिया जाय जिसमें कुछ फारसी अरबी के चलते शब्द भी आएँ। उस समय साहित्य के कोर्स के लिए पुस्तकें नहीं थीं। राजा साहब स्वयं तो पुस्तकें तैयार करने में लग ही गए, पं. श्रीलाल और पं. वंशीधार आदि अपने कई मित्रों को भी उन्होंने पुस्तकें लिखने में लगाया। राजा साहब ने पाठयक्रम में उपयोगी कई कहानियाँ आदि लिखीं, जैसे राजा भोज का सपना, वीरसिंह का वृत्तांत, आलसियों को कोड़ा इत्यादि। संवत् 1909 और 1919 के बीच शिक्षा संबंधी अनेक पुस्तकें हिन्दी में निकलीं।….. प्रारंभ में राजा साहब ने जो पुस्तकें लिखीं वे बहुत ही चलती सरल हिन्दी में थीं, उनमें उर्दूपन नहीं भरा था जो उनकी पिछली किताबों (इतिहासतिमिरनाशक आदि) में दिखाई पड़ता है। उदाहरण के लिए राजा भोज का सपनासे कुछ अंश उद्धृत किया जाता है—

वह कौन सा मनुष्य है जिसने महाप्रतापी महाराज भोज का नाम न सुना हो। उसकी महिमा और कीर्ति तो सारे जगत् में ब्याप रही है। बड़े बड़े महिपाल उसका नाम सुनते ही काँप उठते और बड़े बड़े भूपति उसके पाँव पर अपना सिर नवाते। सेना उसकी समुद्र के तरंगों का नमूना और खजाना उसका सोने चाँदी और रत्नों की खान से भी दूना। उसके दान ने राजा कर्ण को लोगों के जी से भुलाया और उसके न्याय ने विक्रम को भी लजाया।

अपने मानवधर्मसारकी भाषा उन्होंने अधिक संस्कृतगर्भित रखी है। इसका पता इस उध्दृत अंश से लगेगा—

मनुस्मृति हिंदुओं का मुख्य धर्मशास्त्र है। उसको कोई भी हिंदू अप्रामाणिक नहीं कह सकता। वेद में लिखा है कि मनु जी ने जो कुछ कहा है उसे जीव के लिए औषधि समझना; और बृहस्पति लिखते हैं कि धर्म शास्त्राचार्यों में मनु जी सबसे प्रधान और अति मान्य हैं क्योंकि उन्होंने अपने धर्मशास्त्र में संपूर्ण वेदों का तात्पर्य लिखा है।…खेद की बात है कि हमारे देशवासी हिंदू कहला के अपने मानवधर्मशास्त्र को न जानें और सारे कार्य्य उसके विरुद्ध करें।

मानवधर्मसारकी भाषा राजा  की स्वीकृत भाषा नहीं है। प्रारंभकाल से ही वे ऐसी चलती ठेठ हिन्दी के पक्षपाती थे जिसमें सर्वसाधारण के बीच प्रचलित अरबीफारसी शब्दों का भी स्वच्छंद प्रयोग हो। यद्यपि अपने गुटकामें जो साहित्य की पाठयपुस्तक थी उन्होंने थोड़ी संस्कृत मिली ठेठ और सरल भाषा का ही आदर्श बनाए रखा, पर संवत् 1917 के पीछे उनका झुकाव उर्दू की ओर होने लगा जो बराबर बना क्या रहा, कुछ न कुछ बढ़ता ही गया। इसका कारण चाहे जो समझिए। या तो यह कहिए कि अधिकांश शिक्षित लोगों की प्रवृत्ति देखकर उन्होंने ऐसा किया अथवा अंगरेज अधिाकारियों का रुख देखकर। अधिकतर लोग शायद पिछले कारण को ही ठीक समझेंगे। जो हो, संवत् 1917 के उपरांत जो इतिहास, भूगोल आदि की पुस्तकें राजा साहब ने लिखीं उनकी भाषा बिल्कुल उर्दूपन लिए है। इतिहासतिमिरनाशकभाग-2 की अंग्रेजी भूमिका में, जो संवत् 1864 की लिखी है, राजा साहब ने साफ लिखा है कि मैंने बैताल पचीसीकी भाषा का अनुकरण किया है। इसी खींचतान के समय में राजा लक्ष्मण और राजा मैदान में आए। (शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 2 : गद्य का विकास : खड़ बोली का गद्य, पृ. 239,240)

राजा साहब ने अपने इस उर्दूवाले पिछले सिद्धांत का भाषा का इतिहासनामक जिस लेख में निरूपण किया है, वही उनकी उस समय की भाषा का एक खास उदाहरण है, अत: उसका कुछ अंश नीचे दिया जाता है

हम लोगों को जहाँ तक बन पड़े चुनने में उन शब्दों को लेना चाहिए कि जो आम फहम और खासपसंद हों अर्थात् जिनको जियादा आदमी समझ सकते हैं और जो यहाँ के पढ़े लिखे, आलिमफाजिल, पंडित, विद्वान की बोलचाल में छोड़े नहीं गए हैं और जहाँ तक बन पड़े हम लोगों को हरगिज गैरमुल्क के शब्द काम में न लाने चाहिए और न संस्कृत की टकसाल कायम करके नए नए ऊपरी शब्दों के सिक्के जारी करने चाहिए; जब तक कि हम लोगों को उसके जारी करने की जरूरत न साबित हो जाय अर्थात् यह कि उस अर्थ का कोई शब्द हमारी जबान में नहीं है, या जो है अच्छा नहीं है, या कविताई की जरूरत या इल्मी जरूरत या कोई और खास जरूरत साबित हो जाय।

भाषा संबंधी जिस सिद्धांत का प्रतिपादन राजा साहब ने किया है उसके अनुकूल उनकी यह भाषा कहाँ तक ठीक है, पाठक आप समझ सकते हैं। आमफहम‘, ‘खासपसंद‘, ‘इल्मी जरूरतजनता के बीच प्रचलित शब्द कदापि नहीं हैं। फारसी के आलिमफाजिलचाहे ऐसे शब्द बोलते हों पर संस्कृत हिन्दी के पंडित विद्वानतो ऐसे शब्दों से कोसों दूर हैं। किसी देश के साहित्य का संबंध उस देश की संस्कृति परंपरा से होता है। अत: साहित्य की भाषा उस संस्कृति का त्याग करके नहीं चल सकती। भाषा में जो रोचकता या शब्दों में जो सौंदर्य का भाव रहता है वह देश की प्रकृति के अनुसार होता है। इस प्रवृत्ति के निर्माण में जिस प्रकार देश के प्राकृतिक रूप रंग, आचार व्यवहार आदि का योग रहता है उसी प्रकार परंपरा से चले आते हुए साहित्य का भी। संस्कृत शब्दों में थोड़े बहुत मेल से भाषा का जो रुचिकर साहित्यिक रूप हजारों वर्षों से चला आता था उसके स्थान पर एक विदेशी रूप रंग की भाषा गले में उतारना देश की प्रकृति के विरुद्ध था। यह प्रकृतिविरुद्ध भाषा खटकी तो बहुत लोगों को होगी, पर असली हिन्दी का नमूना लेकर उस समय राजा लक्ष्मण सिंह ही आगे बढ़े। उन्होंने संवत् 1918 में प्रजाहितैषीनाम का एक पत्र आगरे से निकाला और 1919 में अभिज्ञान शाकुंतलका अनुवाद बहुत ही सरस और विशुद्ध हिन्दी में प्रकाशित किया। इस पुस्तक की बड़ी प्रशंसा हुई और भाषा के संबंध में मानो फिर से लोगों की आँख खुली। राजा साहब ने उस समय इस प्रकार की भाषा जनता के सामने रखी

अनसूया, (हौले प्रियंवदा से) सखी! मैं भी इसी सोच विचार में हूँ। अब इससे कुछ पूछूँगी। (प्रगट) महात्मा! तुम्हारे मधुर वचनों के विश्वास में आकर मेरा जी यह पूछने को चाहता है कि तुम किस राजवंश के भूषण हो और किस देश की प्रजा को विरह में व्याकुल छोड़ यहाँ पधाारे हो? क्या कारन है जिससे तुमने अपने कोमल गात को कठिन तपोवन में आकर पीड़ित किया है?

(शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 2 : गद्य का विकास : खड़ बोली का गद्य, पृ. 240, 241)

राजा शिवप्रसाद ने उर्दू की ओर झुकाव हो जाने पर भी साहित्य की पाठयपुस्तक गुटकामें भाषा का आदर्श हिन्दी ही रखा। उक्त गुटका में उन्होंने राजा भोज का सपना‘, ‘रानी केतकी की कहानीके साथ ही राजा लक्ष्मणसिंह के शकुंतला नाटकका भी बहुत सा अंश रखा। पहला गुटका शायद संवत् 1924 में प्रकाशित हुआ था। (आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 2 : गद्य का विकास : खड़ बोली का गद्य, पृ. 242)

संयुक्त प्रांत में राजा शिवप्रसाद शिक्षाविभाग में रहकर हिन्दी की किसी न किसी रूप में रक्षा कर रहे थे उसी प्रकार पंजाब में बाबू नवीनचंद्र राय महाशय कर रहे थे। (आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 2 : गद्य का विकास : खड़ बोली का गद्य, पृ. 242)

राजा शिवप्रसाद आमफहमऔर खासपसंदभाषा का उपदेश ही देते रहे। (आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 2 : गद्य का विकास : खड़ बोली का गद्य, पृ. 244)

मुंशी सदासुख की भाषा साधु होते हुए भी पंडिताऊपन लिए थी, लल्लूलाल में ब्रजभाषापन और सदल मिश्र में पूरबीपन था। राजा शिवप्रसाद का उर्दूपन शब्दों तक ही परिमित न था वाक्यविन्यास तक में घुसा था, राजा लक्ष्मणसिंह की भाषा विशुद्ध और मधुर तो अवश्य थी, पर आगरे की बोलचाल का पुट उसमें कम न था। (आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 1 : गद्य का प्रवर्तन : सामान्य परिचय, पृ. 246)

उर्दू के कारण अब तक हिन्दी गद्य की भाषा का स्वरूप ही झंझट में पड़ा था। राजा  और राजा लक्ष्मणसिंह ने जो कुछ लिखा था वह एक प्रकार से प्रस्ताव के रूप में था। (आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 1 : गद्य का प्रवर्तन : सामान्य परिचय, पृ. 246)

राजा शिवप्रसाद या राजा लक्ष्मणसिंह भाषा पर अधिकार रखनेवाले पर झंझटों से दबे हुए स्थिर प्रकृति के लेखक थे। उनमें वह चपलता, स्वच्छंदता और उमंग नहीं पाई जाती जो हरिश्चंद्र मंडल के लेखकों में दिखाई पड़ती है। (आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 1 : गद्य का प्रवर्तन : सामान्य परिचय, पृ. 247)

संवत् 1930 में उन्हों (भारतेंदु) ने अपना पहला मौलिक नाटक वैदिकी हिंसा हिंसा न भवतिनाम का प्रहसन लिखा, जिसमें धर्म और उपासना नाम से समाज में प्रचलित अनेक अनाचारों का जघन्य रूप दिखाते हुए उन्होंने राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद को लक्ष्य करके खुशामदियों और केवल अपनी मानवृद्धि की फिक्र में रहनेवालों पर छींटे छोड़े। भारत के प्रेम में मतवाले, देशहित की चिंता में व्यग्र, हरिश्चंद्रजी पर सरकार की जो कुदृष्टि हो गई थी उसके कारण बहुत कुछ राजा साहब ही समझे जाते थे। (आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 2 : गद्य का प्रवर्तन : प्रथम, पृ. 251)