पाश्चात्य #काव्यशास्त्रियों के प्रसिद्ध #कथन

पाश्चात्य #काव्यशास्त्रियों के प्रसिद्ध #कथन

#काव्य-रचना की जगह ऊन कातना अधिक उपयोगी है। (जर्मन शिक्षाविद कम्पे)

#गुलामी मृत्यु से भी भयावह है। (प्लेटो)

#कविता भाव और संदेशों को उद्दीप्त करती है और तर्क एवं विचार-शून्यता को प्रोत्साहन देती है। (प्लेटो)

#काव्य-रचना की जगह ऊन कातना अधिक उपयोगी है। (जर्मन शिक्षाविद कंपे)

#काव्य-रचना की प्रेरणा ईश्वरीय होती है और कवि दैवी-प्रेरणा से आविष्ट होकर काव्य-रचना करता है। (प्लेटो)

#सभी रचनाओं में आवयविक एकता होनी चाहिए। आंतरिक सामंजस्य के अभाव में कोई भी कलाकृति सुंदर नहीं हो सकती। (प्लेटो)

#चित्रकार अथवा किसी भी अन्य कलाकार की तरह कवि भी अनुकर्ता है। (अरस्तू)

#काव्य प्रकृति की अनुकृति है, पर एकदम नक़ल न होकर उसका पुनः प्रस्तुतीकरण है। (अरस्तू)

#विरेचन-सिद्धांत
#जिस प्रकार रेचक औषधियों द्वारा मनोविकारों को बाहर निकालकर शरीर को शुद्ध करने की क्रिया विरेचन कहलाती है, उसी प्रकार काव्य द्वारा व्यक्ति की करुणा, त्रास आदि मनोविकारों का निष्कासन होकर मानव-मन का परिष्कार होता है, तो काव्यशास्त्र में विरेचन-सिद्धांत कहते हैं।(अरस्तू)

#कविता सभी प्रकार के ज्ञानों का प्रथम एवं अंतिम ज्ञान है। (वर्ड्सवर्थ)

#कविता का ज्ञान कवि की व्यक्तिगत साधना की उपलब्धि है। (वर्ड्सवर्थ)

#कविता ज्ञान का प्राण है, उसकी शुद्ध चैतन्य आत्मा है, वह राग दित्य अभिव्यक्ति है जो समस्त विज्ञान का आश्रय है। (वर्ड्सवर्थ)

#सदकाव्य मानव-मन की बलवती भावनाओं का सहज उचछलन है। (वर्ड्सवर्थ)

#कविता का विषय होता है। सत्य व्यक्तिगत या स्थानीय सत्य नहीं, अपितु सामान्य एवं व्यावहारिक सत्य जो किसी बाह्य साक्ष्य आधारित होकर भावों के माध्यम से समग्र रूप से हृदय में प्रविष्ट हो जाता है। ऐसा सत्य जो स्वयं में अपना  साध्य है।  (वर्ड्सवर्थ)

#मुझे और किसी बात का उतना विश्वास नहीं है जितना हृदय के उदात्त भाव की पवित्रता तथा कल्पना की वास्तविकता पर, कल्पना जिसे सुंदर समझती है वह अवश्य ही सत्य होगा, चाहे उसका अस्तित्व पहले रहा हो या नहीं। (कीट्स)

#काव्य में कल्पना की ही अभिव्यक्ति होती है। (पी. बी. शेली)

#वही व्यक्ति मूलतः अच्छा होता है जो कल्पनाशील होता है। कविता मनुष्य की आंतरिक शक्ति को समृद्ध करती है, जो नैतिक गुणों का मूलाधार है। (पी. बी. शेली)

#सहजानुभूति अभिव्यंजना की आंतरिक प्रक्रिया है। (क्रोचे)

#पागल, प्रेमी और कवि तीनों कल्पना से ओत-प्रोत रहते हैं। (शेक्सपियर)

#साहित्यिक स्वतंत्रता राजनीतिक स्वतंत्रता की पुत्री है। (विक्टर ह्यूगो)

#स्वच्छंदतावाद ही साहित्यिक उदारवाद है। (विक्टर ह्यूगो)

#प्रत्येक कवि शिक्षक होता है, मैं चाहता हूं कि या तो शिक्षक समझा जाऊं या कुछ नहीं। (वर्ड्सवर्थ)
आलोचना सांस की तरह अनिवार्य एवं नैसर्गिक क्रिया है। (टी. एस. इलियट)

#कविता कवि व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति नहीं, व्यक्तित्व से पलायन है। (टी. एस. इलियट)

#कलाकार का मनोविज्ञान अध्ययन का निष्पक्ष क्षेत्र है। (रिचर्ड्स)

#नैतिकता सिर्फ़ दुनियादारी है और संहिता इष्ट सिद्धी की सामान्यतम व्यवस्था की अभिव्यक्ति है। (रिचर्ड्स)

#कविता का अस्तित्व बहिरंग संतुलन और अंतरंग संतुलन के मध्य पूर्ण सामंजस्य के अर्थ में घटित होता है। (एलेन टेट)

#साहित्यिक समालोचना में यथार्थवाद शब्द का प्रयोग आदर्शवाद और स्वच्छंदतावाद के विरोध में उन साहित्यिक कृतियों के लिए किया जाता है जो वास्तविक जीवन की अनुभूति में निर्लिप्त होती है और अपनी विषयवस्तु को वास्तविक जीवन से ग्रहण करती है। (शिफ्ले, डिक्शनरी ऑफ वर्ल्ड लिटरेचर)

#यथार्थवाद साहित्य में एक शैली नहीं बल्कि एक विचारधारा है। (कजामिया)

#सच्चे साहित्य की प्रमुख विशेषता यह है कि लेखक बिना किसी भय या पक्षपात के ईमानदारी के साथ जो कुछ भी अपने पास देखता है, उसका यथातथ्य चित्रण करे। (जॉर्ज लुकास)

#यथार्थवाद का प्रश्न साहित्य में मुख्यतः सत्य से अल्पापंश भी संबंध नहीं रखता, बल्कि इसका संबंध केवल रचना की कलात्मक शैली से है। (स्टीवेंसन)

#प्रतीक जिस वस्तु का प्रतीक है, उस वस्तु को नहीं, उस भाव को, उस धारणा को व्यक्त करता है। (लैंगर)

#किसी शब्द का अर्थ क्रमशः इतना विस्तृत हो जाता है कि उससे परोक्ष विचार या रूप या ज्ञान होने लगता है। अभिव्यक्ति की इस पद्धति को प्रतीकवाद कहते हैं।  (आर्थर सिम्सन)

#प्रस्तुतीकरण के स्तर पर साहित्यिक प्रतीक किसी अन्य वस्तु की ओर संकेत करता है। (रेनवेलेक और आस्टिन वारेन)

#सांकेतिक अभिव्यक्ति का नाम साहित्य है। (इमर्शन)

#कवि की वस्तु एवं उससे प्राप्त संवेदन से युक्त पुनः सृष्टि में उक्त दोनों तत्व आपस में मिलकर बिंब का उत्पादन करते हैं, जिसमें दोनों का औपम्य प्रत्यक्ष होता है। (सी. डी. लेविस)

#बिंब इंद्रियगोचर पदार्थ की प्रामाणिक अभिव्यक्ति है। (जोसेफ टी. शिल्पी)

#मिथक किसी विशिष्ट भाषिक संरचना में बंधा नहीं रहता। एक ही मिथक की विभिन्न भाषिक अभिव्यक्तियां हो सकती हैं।  (ग्राहम हफ)

#बिंब अरूप भाव या विचार की पुनर संरचना है। (ह्वेले)