#तत्सम, तद्भव और देशज शब्द

शब्द-भेद :

बनावट की दृष्टि से शब्द-भेद : रूढ़, यौगिक और योगरूढ़।

#तत्सम, तद्भव और देशज शब्द

#तत्सम शब्द

‘तत्सम’ शब्द उन शब्दों को कहते हैं, जो हिंदी में संस्कृत से ज्यों-के-त्यों ले लिए गए हैं। हिंदी शब्द-भंडार में ऐसे शब्द 70 प्रतिशत से भी अधिक हैं। ज्ञान-विज्ञान, आचार-विचार, नीति-रीति जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसमें ‘तत्सम’ शब्द न हो। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण शब्द प्रस्तुत हैं :

अंक, अंकुर, अंबर, अहंकार, आकाश, आज्ञा, आम्र, आश्विन, आहार, इंदीवर, इंद्रधनुष, ईश, ईर्ष्या, ईहा, उच्चारण, उदय, उदासीन, उष्ट्र, ऊर्जा, ऊहापोह, ऋचा, ऋतु, ऋद्धि, ऋषि, एकांत, एवं, ऐश्वर्य, औषधि, औचित्य, कंकाल, कमल, कलंक, कलेवर, कल्पना, क्षितिज, क्षेम, क्षमा, क्षीर, ख्याति, गंगा, गंध, गरिमा, गायत्री, गीत, गोमल, घटा, घोटक, घोषणा, चंचु, चतुर, चेतन, चतुष्पादिका, चरित्र, छंद, छात्र, छिद्र, जटा, जन, जय, ज्वर, झंकार, टिप्पणी, टीका, डमरू, तट, तंतु, तपस्या, तरुण, तिमिर, दर्शन, दृष्टि, धर्म, धूप, ध्वज, नंदी, नख, शिख, नगर, न्याय, पथ, परिचय, पर्याप्त, पाठ, प्रस्ताव, प्रस्थान, फल, बधिर, बर्बर, बलिष्ठ, बाहु, भंग, भय, मध्यम, मठ, यात्री, रंक, रक्त, रजत, रोम, लक्ष्य, लक्ष्मी, लय, लेप, वंश, वक्र, वधू, विलाप, व्योम, शंका, शंख, शांति, शत, शलाका, शाप, शोक, षष्ठी, षोडशी, संगीत, संताप, समिति, सपत्नीक, सूची, सूर्य, होम, इत्यादि।

#अर्धतत्सम शब्द

उन शब्दों को अर्धतत्सम शब्द कहते हैं, जो संस्कृत से थोड़ा परिवर्तित होकर हिंदी में आए हैं। ये शब्द संस्कृत के अधिक निकट हैं। जैसे : कार्य से कारज, चूर्ण से चूरन, धैर्य से धीरज इत्यादि।

#तद्भव शब्द

तद्भव शब्द उन शब्दों को कहते हैं, जो संस्कृत से ही लिए गए हैं, परंतु हिंदी में आने पर जिनका रूप बदल गया है।

जैसे : अंगोछा (सं. अंगोच्छ), अंधेर (सं. अंधकार), आग (अग्नि), आँक (सं. अंक) आग (सं. अग्नि), आठ (सं. अष्ट), आम (सं. आम्र), इमली (सं. अम्ली), ईख (सं. ईक्षु), उचाट (सं. उच्चाट) उसास (सं. उच्छवास), उसर (सं. ऊषर), ऊँट (सं. ऊष्ट्र), ककड़ी (सं. कर्कटी), कचनार (सं. कांचनार), कपूर (सं. कर्पूर), करेला (सं. कारवेल्ल), कोख (सं. कक्ष), कांसा (सं. कांस्य), काजल (सं. कज्जल), खजूर (सं. खर्जूर) खाट (सं. खट्वा), खाद (सं. खाद्य), खीर (सं. क्षीर) खेत (सं. क्षेत्र), गुटका (सं. गुटिका), गोबर (सं. गोमल, गोमय), घंटी (सं. घंटिका), घोड़ा (सं. घोटक), सौ (सं. शत), सौत (सं. सपत्नी), भात (सं. भक्त), सूई (सं. सूचि), खीर (सं. क्षीर), चंचु (सं. चोंच), चंद (सं. चंद्र), चंपा (सं. चंपक), चतुष्पदिका (सं. चौकी), छत (सं. छत्र), जमाई (सं. जामातृ), जीभ (सं. जीह्वा), जूड़ा (सं. जूट) जौ (सं. यव), झाड़ (सं. झाट), झालर (सं. झल्लरी), टकसाल (सं. टंकशाला), टाँक (सं. टंक), डंक (सं. दंश), तुरनत (सं. त्वरित), तीता (सं. तिक्त), दंतुअन (सं. दंतधावन), दही (सं. दधि), दूध (सं. दुग्ध), धड़ (सं. धर), धरती (सं. धरित्री), धान (सं. धान्य), धुआँ (सं. धूम्र), नंगा (सं. नग्न), पाला (सं. प्रालेय), पीक (सं. पिच्च), बटेर (सं. वर्तक), बत्ती (सं. वर्ति), भँवर (सं. भ्रमर) भालू (सं. भल्लुक), भीत (सं. भित्ति), मुगदर (सं. मुदगर), मोती (सं. मौक्तिक), राख (सं. क्षार), रात (सं. रात्रि), लहसुन (सं. लशुन), लोहा (सं. लौह), लौंग (सं. लवंग), शक्कर (सं. शर्करा), शगुन (सं. शकुन) ससुर (सं. श्वसुर), सोता (सं. स्रोत) हाथ (सं. हस्त), हाथी (सं. हस्तिन्)।

#देशज शब्द

देशज शब्द उन शब्दों को कहते हैं, जो बोलचाल तथा देश की दूसरी भाषाओं से लिए गए हैं। जैसे : कटरा, कटोरा, कलाई, कौड़ी, खिड़की, ठुमरी, ठेठ, डिबिया, डोंगा, चिड़िया, जूता, पगड़ी, लूंगा, लोटा, हुंडी, इत्यादि।

(आधार-ग्रंथ : ‘वृहत् व्यारण भास्कर’, डॉ. वचनदेव कुमार एवं ‘आधुनिक हिंदी व्याकरण और रचना’)